ऑपरेशन सुदर्शन

जब बात देश की हो, तो निजी मतभेदों, दलगत विचारधाराओं और सियासी रंगों से परे, सिर्फ एक ही स्वर गूंजना चाहिए — राष्ट्रहित सर्वोपरि। विचारों का मंथन अच्छा है, तर्क-वितर्क लोकतंत्र की आत्मा हैं, लेकिन देश की अस्मिता पर जब भी कोई आंच आए, तो हर नागरिक को सियासत से ऊपर उठकर सिपाही की भांति सजग और संगठित हो जाना चाहिए

जब बात देश की हो, तो निजी मतभेदों, दलगत विचारधाराओं और सियासी रंगों से परे, सिर्फ एक ही स्वर गूंजना चाहिए — राष्ट्रहित सर्वोपरि। विचारों का मंथन अच्छा है, तर्क-वितर्क लोकतंत्र की आत्मा हैं, लेकिन देश की अस्मिता पर जब भी कोई आंच आए, तो हर नागरिक को सियासत से ऊपर उठकर सिपाही की भांति सजग और संगठित हो जाना चाहिए।

देश की समस्याओं पर बहस हो, संवाद हो, समाधान हो — ये जनतंत्र की खूबसूरती है। लेकिन जब बात पाकिस्तान जैसे पड़ोसी मुल्क की हो, जो बार-बार विश्वासघात और आतंक का ताना-बाना बुनने से बाज़ नहीं आता, तो नर्मी, बातचीत, और संवाद जैसे शब्द शब्दकोश से रिटायर कर देने चाहिए।

यह देश कोई राजनीतिक प्रयोगशाला नहीं, ये 140 करोड़ आत्माओं का स्पंदन है। वो स्पंदन जो सीमाओं पर लहू बहा रहे जवानों के सीने से आता है, खेतों में पसीना बहा रहे किसान की हथेलियों से निकलता है, और लैपटॉप के पीछे बैठा युवा जब किसी सॉफ्टवेयर के ज़रिए भारत का नाम ऊँचा करता है—तो बनता है भारत।

हम 140 करोड़ लोग सिर्फ संख्या नहीं, संवेदना का महासागर हैं। हर दिल की धड़कन में एक सैनिक का साहस और एक माँ का आशीर्वाद है। हमें मिलकर प्रार्थना करनी चाहिए उन वीर जवानों के लिए जो सीमा पर सिर्फ गोलियों से नहीं, हौसले से लड़ रहे हैं।

पाकिस्तान अब कोई रहस्यमयी पहेली नहीं रहा, वो खुली किताब है जिसमें हर पन्ना बारूद से सना है। आतंक का आश्रयदाता और दहशत का दरबारी बन चुका है ये मुल्क। अब इसको लेकर कोई भ्रांति पालना, उसी सर्प को दूध पिलाने जैसा है जो समय आने पर डंसेगा ही।

इतिहास से लेकर वर्तमान तक, उनके हर कर्म ने यह साबित कर दिया है कि वो न तो वार्ता योग्य हैं, न ही विश्वास योग्य। हर बार दोस्ती का हाथ बढ़ाने पर उन्होंने पीठ में खंजर ही घोंपा है।

शांति की बात वहाँ होती है, जहाँ सामने वाला भी इंसान हो। जहाँ सामने भेड़िए हों, वहाँ मौन नहीं, प्रतिकार ही धर्म है। शांति तब तक मूल्यवान है जब तक वो आत्मसम्मान की कीमत पर न हो।

प्रतिकार में उठाया गया शस्त्र, धर्मयुद्ध बन जाता है।

और अंत में, वर्तमान केंद्र सरकार को भी साधुवाद देना होगा, जो अब आँख में आँख डालकर जवाब देती है। हम वो दिन भी देख चुके हैं जब लालकिले की प्राचीर पर चुप्पी थी, और संसद हमले के बाद भी सत्ता के गलियारों में सन्नाटा पसरा था। पर अब समय बदल चुका है—अब देश बोलता नहीं, जवाब देता है।

अब वक्त है कि कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से कोहिमा तक एक ही जयघोष गूंजे —

"भारत माता की जय!" "वंदे मातरम्!"

राहुल मिश्रा 

गोरखपुर , उत्तर प्रदेश

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